भारत सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत देश की सभी मेट्रोपोलिटन शहरों में नागरिक सुविधाओं की सुगमता से उपलब्धता के आधार पर रैंकिंग देने का कार्य आरंभ किया था। 2017 में जब योगी जी ने प्रदेश के मुखिया के रूप में अपनी पारी आरंभ की थी तो इस स्वक्षता मिशन में प्रदेश की राजधानी 269 वीं पायदान पर खड़ी थी।
यह संयोग ही था इसी वर्ष राजधानी को पहली महिला मेयर के रूप में संयुक्ता भाटिया का नेतृत्व भी मिला।
संयुक्ता भाटिया जी के मेयर काल में वर्ष दर वर्ष राजधानी लखनऊ के लिए स्वच्छता मानदंडों की इस रैंकिंग में सुधार होता नजर आया और 2021 तक राजधानी स्वक्षता रैंकिंग में बारहवीं पायदान तक की दूरी तय कर चुकी थी।
2023 में संपन्न मेयर के चुनाव में भाजपा ने एक बार पुनः बाजी तो मार ली लेकिन उसके बाद वर्ष दर वर्ष राजधानी की स्वच्छता रैंकिंग में गिरावट दर्ज की गई। हालात यह है कि विगत वर्ष यह रैंक फिसल कर 44 वें पायदान पर पुनः आ चुकी है।
गली मोहल्लों की तो कौन कहे शहर के प्रमुख स्थान भी गंदगी के ढेर से अछूते नहीं है।
कहने को तो नगर निगम ने प्रत्येक वार्ड में कूड़ा उठाने वाली गाड़ी के पहुंचने की व्यवस्था की है लेकिन ये कूड़ा गाड़ियां कितना काम करती हैं यह बस इतनी सी बात से समझा जा सकता है कि शायद ही शहर की प्रत्येक कालोनी में कूड़ा बटोरने वालीं निजी ठेलिया चालक अवश्य आते हैं। वो.आई.पी मोहल्लों को छोड़कर शायद ही किसी मोहल्ले में नालियां स्वच्छ हों। अधिकांश मोहल्लों में टूटी और बजबजाती नालियां देखी जा सकती हैं।
नगर निगम की नाली सफाई की व्यवस्था से विक्षुब्ध होकर छोटी कालोनियों में अधिकांश निवासियों ने इसी के चलते अपने मकान के सामने नाली को बंद कर रखा है ताकि बजबजाती नाली की बदबू से उसे राहत मिल सके।
मुस्कुराइए कि आप लखनऊ में है कहने वाला लखनऊ का नागरिक आज अदम गोंडवी की यह पंक्तियां दोहराने के लिए बाध्य है कि
“तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है “