अयोध्या। राम नगरी के मध्य स्थित माता सीता की कुल देवी के रूप में माता देवकाली का मंदिर है। जहां नगर देवी सर्वमंगला पार्वती माता गौरी के रूप में विराजती हैं। ऐसी मान्यता है, कि मां सीता जब जनकपुरी से अपने ससुराल अयोध्या के लिए चलीं थीं तो अपने कुल देवी माता गौरी की प्रतिमा साथ ले आईं थीं. वहीं प्रतिमा यहां स्थापित है. महाराज दशरथ ने अयोध्या स्थित सप्त सागर के ईशानकोण पर माता गौरी का मंदिर बनवा दिया था, जहां माता सीता तथा राजकुल की अन्य रानियां पूजन करने जाती थीं.
रामायण कालीन मंदिर अपनी भव्यता और श्रेष्ठता के चलते भारत का प्रमुख देवस्थल बन चुका था। हूणों और मुगलों के आक्रमण से देवकाली मंदिर 2 बार ध्वस्त हुआ. पहली बार इसका पुनर्निमाण महाराज पुष्यमित्र ने और दूसरी बार मुगलों द्वारा ध्वस्त किए जाने पर बिन्दु संप्रदाय के महंत ने इस भव्य मंदिर के स्थान पर एक छोटी सी कोठरी का निर्माण कराया। तब से आज तक इस मंदिर में पूजा पाठ चल रहा है. रूद्रयामल और स्कन्दपुराण में भी श्री देवकाली जी और उनके मंदिर का उल्लेख मिलता है, जिससे इस ऐतिहासिक मंदिर की पौराणिकता प्रमाणित होती है।
चीनी यात्री ह्वेनसांग व फाहियान ने भी अपनी यात्रा में इस मंदिर की प्रतिष्ठा, वैभव और विशेषता का उल्लेख किया है। पुजारी अजय द्विवेदी बताते हैं कि यह अयोध्या का सिद्ध शक्तिपीठ स्थान माना गया है. अयोध्या में जब किसी भी परिवार में विवाह संपन्न होता है, तो पति-पत्नी जोड़े मंदिर आते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस मंदिर में जानकी नवमी सबसे प्रमुख त्यौहार माना गया है, जहां 10 दिवसीय आयोजन किया जाता है। माता गौरी की विशाल शोभायात्रा भी नगर भ्रमण के लिए निकलती है, जिसमें हजारों की संख्या में देवी भक्त शामिल होते हैं. इसके अलावा नवरात्रि पर भव्य झांकी और महा आरती का आयोजन किया जाता है।