1793 में लार्ड कार्नवालिस ने भारतीयों पर शासन के उद्देश्य से जिस सिविल सेवा के मुलाजिमों को कल्पना की गई थी वह भारत के संसाधनों के अधिकतम दोहन और भारतीयों के मन में कंपनी के शासन की सर्वोच्चता स्थापित करती थी। तब इस सेवा में प्रवेश की अनिवार्य शर्त अंग्रेज नागरिक होना थी।
कालांतर में बदली हुई परिस्थितियों में भारतीयों पर शासन करने में अंग्रेजों को समझ आने वाली चुनौतियों को देखते हुए भारतीयों को भी इस सेवा में प्रवेश की अनुमति दी गई थी जो अंग्रेजी के जानकार हों और इंग्लैंड जाकर परीक्षा पास करके स्वयं को अंग्रेजों के मानदंडों पर खरा उतरने की आवश्यक शर्त को पूरा कर लेते थे।
1893 में अंग्रेजी अहंकार इस सीमा तक बढ़ चुका था कि उसे दक्षिण अफ्रीका में भी एक भारतीय बैरिस्टर को प्रथम श्रेणी के रेल के डिब्बे में बैठे देखना असहनीय लगने लगा तो उसे धक्का देकर ट्रेन के कूपे से बाहर निकाल गया।
वो तो भला हो उस युवा भारतीय बैरिस्टर का जिसने अंग्रेजी अहंकार को दक्षिण अफ्रीका में चुनौती दी और उसकी गूंज सात समंदर पार भारत में भी सुनाई दी। अंग्रेजों को इस अहंकारपूर्ण घटना ने उस युवा बैरिस्टर को कालांतर में महात्मा गांधी बनने की प्रेरणा दी।
1922 में जब पहली बार अंग्रेजी अहंकार की पर्याय बन चुकी इस सिविल सेवा के चयन हेतु भारत में परीक्षा आयोजित करने की योजना बनाई गई थी तब भी अंग्रेजों के मन में भारतीयों पर अहंकार पूर्वक शासन करने का उद्देश्य ही उसका मूल भाव था।
1947 में आजादी मिलने के बाद अंग्रेजी शासन का पर्याय बन चुकी यह इंपीरियल सिविल सर्विस भी दो भागों में विभक्त हुई और भारत में इसका नाम ‘भारतीय प्रशासनिक सेवा’ अर्थात आई.ए.एस किया गया जबकि पाकिस्तान ने इसे केंद्रीय इंपीरियल सर्विस का ही नाम दिया।
स्वतंत्र भारत के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने भारतीय प्रशासनिक सेवा को भारत के प्रशासन का स्टील स्ट्रक्चर की संज्ञा दी और इसमें कार्य करने वाले राजकीय सेवकों को जनता के लिए सुलभ अहंकार मुक्त सेवा प्रदान करने का आह्वाहन भी किया।
समय के साथ भारतीय प्रशासनिक सेवा के अनेक अधिकारियों ने समर्पण के साथ इस सेवा में अपना योगदान भी दिया लेकिन उत्तर प्रदेश जैस विशाल प्रदेश में ऐसे भी अवसर आए जब इस सेवा के अधिकारियों ने सेवा की साख बचाने के लिए अपने बीच से महाभ्रष्ट अधिकारी चुनने की परम्परा भी आरंभ की।
इस सेवा के अधिकारियों अनेकानेक विशेषणों से भी सुशोभित किया जाता रहा जिसमें बड़े से बड़ा घोटाला करने के बाद भी इस सेवा के अधिकारियों का सुरक्षित बने रहना इस सेवा के फुल फॉर्म को जनसाधारण की नजर में आई. ए .इस.अर्थात ‘ आई एम सिक्योर्ड सर्विस’ (मैं सुरक्षित हूं) भी कही जाती रही है।
भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी श्री अनिल स्वरूप में सेवा से जुड़े अपनी संस्मरणात्मक पुस्तक (नॉट जस्ट आ सिविल सर्वेंट) में इस बात का जिक्र किया है कि इस सेवा के नए अधिकारियों में कितना अहंकार व्याप्त होता जा रहा है और वे सेवा के क्षेत्र से किस प्रकार दूर होते जा रहे हैं।
आज स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि जिन्हें देश के प्रशासन का स्टील स्ट्रक्चर कहा जाता था वो स्वयं रीढ़ विहीन होकर निजी स्वार्थ में किसी भी हद तक जाने को तत्पर हैं।
ऐसा प्रतीत होता है कि इस सेवा के अधिकारीगण स्वयं को आम जनता के समान भारत का सामान्य नागरिक न मानकर स्वयं को अग्रेजों के बनाए उसी इलीट संवर्ग का समझने लगे हैं जिन्हें अपने अहंकार के सामने किसींक दुख दर्द संवेदना दिखलाई ही नहीं पड़ता।
इस बात की आवश्यकता गंभीरता से अनुभव की जा रही है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी आम जन और अधीनस्थों के प्रति पर्याप्त सहृदयतापूर्ण व्यवहार प्रदर्शित करें ताकि देश की यह प्रतिष्ठित सेवा ‘भारतीय अहंकार सेवा’ न बनने पाए।