उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कल सुबह गोंडा में आयोजित एक कार्यक्रम में ऐलान किया कि वो भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने वाले है और शाम होते होते लखनऊ से एक ऐसे अधिकारी के निलंबित होने की खबर आई जो मुख्यमंत्री जी के काफी करीबियों में मना जाता रहा है। यह मुख्यमंत्री की पसंद ही थी कि प्रदेश की लंबी चौड़ी ब्यूरोक्रेसी में उन्हें लखनऊ विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष और लखनऊ के जिलाधिकारी के रूप एक साथ काम करने का अवसर मिला।
हालांकि कोविड के नियंत्रण के दौरान इनके स्वयं कोविडग्रस्त हो जाने के कारण कोविड नियंत्रण में कुछ और अफसर भी मुखिया की पसंद बने लेकिन यह सच है कि ढेरों अधिकारियों की भीड़ के बीच मुखिया को यूपी इन्वेस्ट के लिए भी वही नाम दिखलाई पड़ा था जिसने बीते कल मुखिया की भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था का माखौल उड़ा दिया।
ताजा घटनाक्रम में उस विश्वशनीय अधिकारी ने किसी तकनीकी समिति के द्वारा अनुमोदित स्वीकृतियों के विपरीत नया तकनीकी परीक्षण कराने का आदेश बिना किसी सक्षम स्वीकृति के जारी कर दिया। इस दुस्साहसपूर्ण कदम से विश्वास प्राप्त अधिकारियों के दुस्साहस की बानगी देखी जा सकती है। बहरहाल यह पहला अवसर नहीं है जब किसी भरोसेमंद अधिकारी पर उंगली उठी हो। पूर्व में भी ऐसे अनेक अवसर आएं है जब विश्वासपात्र अधिकारियों ने विश्वाश की डोर को तोड़ा है।
अधिकारियों को यह समझना होगा कि योगी जी की सरकार जीरो टॉलरेंस के फार्मूले पर शत प्रतिशत चलने में यकीन रखती है इसलिए उन्हें अपनी निष्ठाएं निजी स्वार्थ से परे प्रदेश और देश के हित में ही लगानी होगी अंततः जीरो टॉलरेंस का अगला शिकार वह स्वयं बन सकता है।