बाबा साहब भीमराव आंबेडकर के जिस संविधान के अंतर्गत देश के बड़े से बड़े संवैधानिक पदों पर बैठे महानुभावों को भी देश के कानून के सम्मुख समानता का व्यवहार रखने की ताकीद दी गई है। जिस संविधान की दुहाई देकर प्रभावशाली व्यक्तियों को भी न सिर्फ लताड़ती रहती है अपितु जेल भेजने में भी गुरेज नहीं करती। वही न्यायपालिका क्या उस समय भी वैसा ही समानता का व्यवहार अपनाती है जैसा देश के अन्य सामान्य नागरिकों के मामले में अपनाती है जब कटघरे में कोई और नहीं अपितु स्वयं मिलार्ड हों..?
जिस देश में चुने हुए जनप्रतिनिधियों और मुख्यमंत्रियों को सिर्फ इसलिए महीनों जेल में रहना पड़ा हो क्योंकि यह माना जाता रहा कि मंत्री अथवा मुख्यमंत्री होने के नाते उनके द्वारा आरोपित की गई नीतियों के क्रियान्वयन में भ्रष्टाचार की आशंका है उसी देश में एक मिलार्ड के परिसर से नोटों की जलती होली की तस्वीरें आम जनता के सामने आने के बाबजूद किसी जिम्मेदार की ओर से एक प्राथमिकी तक नहीं अंकित कराई जाती।
माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा इस हेतु गठित जांच समिति की जांच रिपोर्ट आनी अभी बाकी है लेकिन एक आम भारतीय नागरिक के मन में पहला सवाल यही कौंध रहा है कि क्या सचमुच देश में एक देश एक विधान लागू भी है अथवा नहीं..?
इस एपिसोड से माननीय न्यायालय की साख न सिर्फ धूमिल हुई है अपितु अब तक चुपके चुपके फुसफुसाहट के साथ कहा जाने वाला शंकालु प्रश्न खुल कर प्रगट होने लगा है।
कौन जानता है कि आने वाले समय में यह संभावना प्रबल पाई जाय कि भारतीय न्याय पालिका की छवि को धूमिल करने के लिए यह कांड प्रायोजित रहा हो लेकिन इस घटना के कारण देश की न्यायपालिका कि प्रतिष्ठा पर गंभीर आघात पहुंचा है।
एक सामान्य नागरिक कि हैसियत से यह शंका सबके मन में अवश्य उत्पन्न हुई है कि इतनी बड़ी घटना की कोई प्रथम सूचना रिपोर्ट तह क्यों नहीं की गई।
न्यायमूर्ति के बंगले पर सुरक्षा हेतु तैनात सुरक्षा गार्डों के कक्ष से जुड़ा स्टोर रूम किन परिस्थितियों में आग की चपेट में आया?
माना कि दुर्घटनावश आग लग ही गई थी तो आग बुझाने के बाद अधजला मलबा किसने हटाया..?
न्यायमूर्ति ने तो सुप्रीम कोर्ट को सौंपे अपने स्पष्टीकरण में यह तक बता दिया है कि वो घटना वाले दिन भोपाल में थे और उनके आवास पर उनकी बेटी और माताजी उपस्थित थी लेकिन आग लगने के बाद जलती हुई न्यायपालिका के विश्वास की होली की घटना और उसके बाद अधजले न्यायपालिका के विश्वास के मलबे की सफाई तक की घटना से उन्हें दूर रखा गया।
जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा सार्वजनिक की गई तस्वीरों के बाद यह देश की सबसे वायरल तस्वीर बन गई तब जाकर स्थानीय पत्रकारों और सफाई कर्मियों में उनके आवास के पास नालियों से अधजली भारतीय मुद्रा तस्वीरें प्राप्त कर प्रकाशित की।
आश्चर्य का विषय यह है कि अभी देश में गतिमान अन्य न्यायिक जांचों के अनुरूप इस जांच एक भी निष्कर्ष आना बाकी है लेकिन आम जन अपने अपने हिसाब से निष्कर्ष निकाल चुकी है।
अंतिम नतीजा चाहे जब आए लेकिन न्यायपालिका पर विद्यमान आम जनमानस के विश्वाश को इस एपिसोड ने गहरी चोट दी है।