वर्ष विविध भाॅति के होते हैं।भारतीय स्वदेशी नूतन वत्सर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा दिनांक 30 मार्च से प्रारंभ हो रहा है।यही वासंतिक नवरात्र के प्रारम्भ का दिन है।पौराणिक उल्लेखों के अनुसार ब्रह्मा जी ने इसी दिन सृष्टि का सृजन प्रारम्भ किथा था।कहा गया है,”चैत्र मासे जगद्ब्रह्म समग्रे प्रथमेऽहनि।शुक्ल पक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदये सति”।।वराह पुराण के अनुसार प्रतिपदा को अग्नि,द्वितीया को दक्ष कन्या सती,तृतीया को हिमालय पुत्री गौरी,चतुर्थी को गणेश जी,पञ्चमी को सर्प,षष्टी को कार्तिकेय,सप्तमी को आदित्य,अष्टमी को मातृकाएं और नवमी को दुर्गा जी की उत्पत्ति हुई।सनातन धर्मी वत्सरारम्भ व्रत और तप से प्रारंभ करते हैं।तप में अमित ऊर्जा निहित है।ब्रह्मा जी पहले बिना तप के सृष्टि सृजन करना चाहते थे,जो सम्भव नहीं हो पाया।तब आकाशवाणी हुई,”स्पर्शेषु यत्षोडषमेकविंशः”।अर्थात् स्पर्शाक्षरों में सोलहवाॅ और इक्कीसवाॅ यानी ‘त’ और’प’ करो।यह विष्णु भगवान का स्वर था।विधाता ने वैसा ही किया और शक्ति सम्पन्न होकर सृजन में समर्थ हुए।देवी भागवत के अनुसार श्रीराम ने,रावण पर विजय पाने हेतु,नारद की सलाह,पर शारदीय नवरात्र व्रत रक्खे।उन्हें देवी जी ने दर्शन दिये।विजय का आशीर्वाद देने के साथ साथ देवी माॅ ने उन्हें वासंतिक नवरात्र उपवास रखने का भी आदेश दिया।”वसन्ते सेवन कार्य त्वया तत्रातिश्रद्धया”।श्रीराम ने वैसा ही किया।नवरात्र व्रत में प्रथम दिन माॅ के शैलपुत्री रूप की उपासना अर्चना होती है।इसके पश्चात् अगले दिनों में क्रमशःब्रह्मचारिणी,चंद्रघण्टा,कूष्माण्डा,स्कंदमाता,कात्यायनी,कालरात्रि,महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजा अर्चना का विधान है।