आज मुझे एक ऐसे विषय पर अपने विचार व्यक्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, जो न केवल हमारे समाज की जड़ों से जुड़ा है, बल्कि हमारे राष्ट्र के भविष्य को आकार देने की क्षमता भी रखता है — “थाली से प्रगति तक : बालिकाओं के समग्र विकास में पोषण की भूमिका।”
हम सभी जानते हैं कि “स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है” — और यह धन तभी प्राप्त होता है जब हमारा आहार संतुलित और पोषक तत्वों से भरपूर हो। बालिकाओं के लिए पोषण का महत्व और भी अधिक हो जाता है, क्योंकि वे न केवल वर्तमान समाज की आधारशिला हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की संरक्षिका भी हैं।
एक संतुलित थाली जिसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन, खनिज और फाइबर हो — वह न केवल शरीर को शक्ति देती है, बल्कि सोचने, समझने और निर्णय लेने की क्षमता भी बढ़ाती है। किशोरावस्था में यह पोषण विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह समय शारीरिक और मानसिक बदलावों का होता है।
कुपोषण: एक मौन चुनौती
दुख की बात यह है कि आज भी भारत की लाखों बालिकाएं कुपोषण का शिकार हैं। राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के अनुसार, ग्रामीण भारत में कई किशोरियाँ एनीमिया (रक्त की कमी) से पीड़ित हैं। इसके पीछे कई कारण हैं — जैसे भोजन में विविधता की कमी, जागरूकता का अभाव, लिंग आधारित भेदभाव, और गरीबी।
अक्सर देखा जाता है कि परिवारों में बेटियों की थाली में सबसे अंत में खाना पहुँचता है — और वह भी अधूरा। ऐसी स्थिति में उनका शारीरिक विकास तो प्रभावित होता ही है, साथ ही पढ़ाई-लिखाई, खेलकूद, और सामाजिक जीवन में भागीदारी भी सीमित हो जाती है।
पोषण और आत्मनिर्भरता का संबंध
यह समझना आवश्यक है कि पोषण केवल शरीर की आवश्यकता नहीं है, बल्कि आत्मनिर्भरता की पहली सीढ़ी है। एक स्वस्थ बालिका ही आत्मविश्वास से भरी होगी, वह पढ़ाई में आगे बढ़ेगी, अपने करियर का निर्माण करेगी, और अपने अधिकारों के लिए खड़ी होगी।
आज जब हम “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे अभियानों की बात करते हैं, तो हमें “पोषित बेटी , पोषित समाज” को भी उतनी ही गंभीरता से लेना होगा। क्योंकि जब बेटी का शरीर और मन दोनों स्वस्थ होंगे, तभी वह समाज और राष्ट्र के विकास में भागीदार बन सकेगी।
सरकारी प्रयास और सामाजिक जिम्मेदारी
सरकार द्वारा मिड-डे मील, आईसीडीएस (एकीकृत बाल विकास सेवा) और सुपोषण अभियान जैसे कई प्रयास किए जा रहे हैं, जिनका उद्देश्य बालिकाओं को पोषण प्रदान करना है। लेकिन केवल सरकारी योजनाओं से ही बदलाव संभव नहीं है।
समाज के हर वर्ग — माता-पिता, शिक्षकों, स्वास्थ्य कर्मियों और स्वयंसेवी संगठनों — को भी मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि हर बालिका की थाली में पोषण हो, प्यार हो, और पहचान हो।
“एक पोषित थाली केवल एक पेट नहीं भरती, वह एक सपना संजोती है।”
यदि हम हर बालिका को सही आहार, शिक्षा और सुरक्षा दें, तो वह ना केवल अपने लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रगति की राह बना सकती है।
आइए, मिलकर संकल्प लें कि हम हर बालिका की थाली को पोषण से भरेंगे, ताकि वह आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता से भरा जीवन जी सके।