लगता है विगत कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति टाइम मशीन पर सवार हो गई है। राजनेता वर्तमान विकास मुद्दों की बात करने के स्थान पर इतिहास की बात ज्यादा कर रहे हैं। देश की प्रगति में पुराने राजनेताओं के योगदान की सकारात्मक चर्चा करने के स्थान पर उनके व्यक्तित्व के ऋणात्मक पक्ष की चर्चा करते हुए देश में विद्यमान समस्याओं के लिए उन्हें उत्तरदाई ठहराया जा रहा है। टाइम मशीन पर सवार भारतीय राजनीति गांधी और नेहरू के निर्णयों की समीक्षा कर रही हैं।
उनके सार्वजनिक निर्णयों के कारण उत्पन्न हुई समस्याओं को समझ कर उन्हें हल करने की दिशा में प्रयास करने के स्थान पर उनके व्यक्तिगत जीवन पर हमले किए जा रहे हैं।
इस टाइम मशीन पर सवार होकर यात्रा सिर्फ अंग्रेजों की दासता से मुक्त हुए भारत की स्वतंत्रता पर हुए विभाजन तक ही नहीं पहुंचती अब तो यह यात्रा राणा सांगा औरंगजेब और बाबर के काल तक भी पहुंच चुकी है।
आज जब समूचे विश्व में भारत ही सर्वाधिक युवा आबादी वाला देश है तब भारतीय राजनीति की टाइम मशीन पर सवार होकर की जाने वाली यह यात्रा संतोषजनक नहीं कही जा सकती।
यदि “बीती ताहि बिसरी दे आगे की सुधि ले” के सिद्धांत को अपनाने की भारतीय मनीषियों की परम्परा का अनुसरण करने की परम्परा का निर्वहन नहीं करेंगे तो अगले बीस पच्चीस वर्षों के उपरांत जब भारत सर्वाधिक बुजुर्ग जनसंख्या वाला देश बन जाएगा तब उन्हें अफसोस होगा कि जीवन के सर्वाधिक ऊर्जा वाले युवा काल को उन्होंने अर्थहीन निरर्थक बातों के लिए जाया कर दिया।