दो दिन से दिल्ली में एक न्यायाधीश के घर पर लगी आग में नोटों का जखीरा मिलने की खबर जोर शोर से चल रही है। देश के बड़े बड़े अखबारों में भी अपने मुख्य पृष्ठ लीड खबर के रूप में इसे प्रकाशित किया है। उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति से जुड़ा होने के कारण इस खबर की पुष्टि में तत्काल कोई वीडियो अथवा चित्र प्रकाशित नहीं किया गया। न तो उन दमकल कर्मचारियों की ओर से जो उन जज साहेब के घर पर लगी आग बुझाने गए थे और न ही उस उच्चतम न्यायालय ने जिसने उन्हें तत्काल दिल्ली उच्च न्यायालय से प्रयागराज भेजने की तैयारी कर ली थी। जिस देश में मीडिया इतना सतर्क हो चुका हो कि छोटी छोटी घटनाओं के वीडियो बनाकर वायरल करने में उसे महारत हासिल हों वहां इस घटना में बरामद नोटों के जखीरे का कोई वीडियो अथवा तस्वीर देश के सामने न आ सके यह नितांत अविश्वनीय था। देर शाम उच्चतम न्यायालय के सौजन्य से एक वीडियो जारी हुआ है जिसमें एक दमकल कर्मी मोबाइल से वीडियो रिकॉर्ड करते हुए यह कहता हुआ सुनाई दे रहा है कि “यहां तो महात्मा गांधी में आग लग रही है भाई..”। स्वतंत्र भारत में यह शायद पहला मौका है जब न्यायमूर्ति कहे जाने वाले किसी महापुरुष के आवास पर नोटों की जलती होली की यह तस्वीर आम जनता ने देखी।
एक ऐसा ही वाकया लगभग साल भर पहले भी इसी तरह मीडिया की सुर्खी बना था जब उत्तर प्रदेश के एक अधिकारी के तथाकथित नैनीताल स्थित आवास पर भारी मात्रा में नोटों की चोरी का शिगूफा तेजी से खबरों में आया था। उस खबर में कोई सबूत वीडियो या फोटो मीडिया को उपलब्ध नहीं हो सका था, सुना यह भी गया कि उस प्रकरण में बरामद रुपयों की अघोषित जप्ती भी हुई थी लेकिन इसके कोई सबूत सार्वजनिक नहीं हुए। तब प्रदेश के एक जबरिया सेवानिवृत आई.पी.एस की घटना से जुड़ा बयान देने के लिए सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगनी पड़ी थी।
इस प्रकार की घटनाएं अचानक प्रगट होती हैं और ढेर सारी चर्चा के बीच चुपचाप दफन भी हो जाती है।
क्या सार्वजनिक स्वतंत्रता के नाम पर देश की मीडिया आज इतनी गैर जिम्मेदार हो चुकी है कि बिना सिर पैर की खबरें चलाने तक में उसे कोई गुरेज नहीं रहा अथवा ऐसी खबरें किसी विशेष उद्देश्य को लेकर जानबूझकर किसी नामवर की छवि को बट्टा लगाने के लिए चलाई जाने लगी हैं?
यदि ऐसा है तो हम सचमुच पत्रकारिता के उस खतरनाक दौर से गुजर रहे हैं जिसमें पत्रकारिता सोशल मीडिया के माध्यम से शातिर राजनीति के हाथों की कठपुतली बन चुकी है।
कोई जज अगर निष्पक्षता के साथ ऐसे फैसले देने की हिम्मत दिखाता है जो सत्ताधीशों की सदिच्छा से मेल नहीं खा रहा तो संताधीशों की सोशल मीडिया ट्रोल आर्मी उसे अपने तरीके से निबटाने की वैसी है सुपारी ले लेती है जैसे कोई माफिया अपने प्रतिद्वंदी को रास्ते से हटवाने की सुपारी ले लेता है। बस इसके बाद मौका देखकर यह सोशल मीडिया ट्रोल आर्मी आनन फानन में संबंधित न्यायाधीश की चारित्रिक हत्या करने के लिए किसी भी तरह का प्रपंच रच सकती है। ठीक इसके उलट अगर न्यायाधीश का कोई ऐसा वक्तव्य जो देश की अखंडता और सभी धर्मावलंबी नागरिकों की संविधान के सम्मुख समानता के आधिकार के प्रतिकूल आशय प्रदान करने वाला भी हो तो उसके महिमामंडन के लिए वही सोशल मीडिया ट्रोल आर्मी ठेका ले लेती है और पूरी ताकत से उसकी प्रतिरक्षा में जुट जाती है।
देश के जिम्मेदार नागरिकों को इस अंतर को समझना होगा कि उन्हें किस सीमा तक मानसिक गुलामी के दौर में धकेला जा रहा है जहां एक छोटे से स्मार्ट फोन और बड़ी सोशल मीडिया ट्रोल आर्मी के माध्यम से वो ऐसी अंधी सुरंग में आगे बढ़ता जा रहा है जहां से बाहर निकलने का शायद कोई रास्ता ही न हो।
ऐसे में यह यक्ष प्रश्न खड़ा होता है कि न्यायाधीश के आवास से नोटो का जखीरा बरामद होने का वह समाचार कुछ ऐसी ही अनसुलझी गांठों को सार्वजनिक करने के लिए तो नहीं प्रायोजित किया गया था..?